पथरुघात विद्रोह । Patharughat Rebellion |
ब्रिटिश ने अपने काले मंसूबे और चालाकी से भारत को गुलाम तो बना लिया लेकिन भारत के लोगो ने हर तरह से ब्रिटिश को भगाने के लिए प्रयत्न किया। इतिहास पन्नो मे दर्ज कई विद्रोह इसीका प्रमाण देता है। इन विद्रोह में से एक विद्रोह पथरुघात का बिग्रोह था। ईस्ट इंडिया कंपनी के घिनोने कर नीति के खिलाफ खड़े हुए किसानों की कहानी बताती है यह पथरुघात का विद्रोह। इस विद्रोह को पथरुघात (या पथरिघाट) रन से भी जाना जाता है।
पथरुघात विद्रोह का कारण
१८२६ (1826) के २४(24) फरवरी के दिन ब्रिटिश और मान राजा के बीच हुए यांदाबू संधि के जरिये असम ब्रिटिश का अधीन हो जाता है। उसके बात से ही असम पहले लम्बे बार समय के लिये गुलामी के बेरी में जकड़ जाता है।
भारत से पैसे लुत कर
ब्रितिश लुतेरे अपने देश में सोने का खदान खोलने के मंसुबे से भारत के लोगों के
ऊपर कर नीति प्रयोग करने लगा। उसी मंसुबे को आगे रख कर ब्रिटिश ने असम के किसानों के ऊपर कर का मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था। १८३२-३३ (1832-33) में ब्रिटिश ने हर किसान के ऊपर ३ (3) रुपये कर लगाकर ४१,५०६ (41,506) रुपये खजाना उठाया था। इसके साथ ही ब्रिटिश ने कर बसूली का अलग अलग उपाई निकाला। उनलोगों ने कृषि जमीन के तीन हिस्से किये। पहला हिस्सा बस्ती, दूसरा हिस्सा रुपित (तराई की खेती के लिए उपयोग) और तीसरा फिरिंगति (बाम खेती के लिए उपयोग)। इन सभी हिस्सों में अलग अलग कर लगाकर कर शुल्क का मात्रा बृद्धि किया। जिससे जरिये ब्रितिश ने १८४२-४३ (1842-43) में १,३५,४५८ (1,35,458), १८५२-५३ (1852-53) में १,५७,७५९ (1,57,759) और १८६२-६३ (1862-63) में ७,४३,४८९ (7,43,489) खजाना संग्रह किया। इसके बाद ब्रिटिश ने फिर से १८९२-९३ (1892-93) में कर मात्रा ५ रुपये तक बढ़ा दिया। किसानों का हलात बत से बत्तर हो रहा था।
पथरुघात विद्रोह का आरम्भ
ब्रितिश के लोभी पन से अतिस्थ हो कर असम के कई जिलो और गांव के किसानों ने बिरोध प्रदर्शन किया था। इसमें १८६१ (1861) में नगांव के फुलगुरी का विद्रोह प्रथम विद्रोह था। जो “फुलगुरी धेवा” नाम से प्रसिद्ध हैं। इसके बात १८६९ (1869) में बारपेटा जिला के बजाली में, १८९४ (1894) के १० (10) जनवरी में कामरूप जिले के रंगिया उसके बाद कई जगहों पर बिद्रोही होने लगा था। सभी किसान ब्रिटिश के खिलाफ एक जुट होने लगे थे। असम के दरंग जिले में भी इसका गहरा असर होने लगा। दरंग जिले के किसानों ने सभी किसानों के साथ बैठक किया और यह निर्णय लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए हम खजाना नही देंगे।
पथरुघात विद्रोह का दिन
१८९४ (1894) के २८ (28) जनवरी में पथरुघात में एक बैठक होता है। जहा काई जिलो के किसान भी पोहस्ते है। हजार हजार लोग तहसीलदार के बंगलो के आगे इकठा होकर "हरि बोल" "अल्लाह हु अकबर" का नारा लगाने लगता है। तभी दरंग जिलाधिपति मि. एंडारचन, आरक्षी प्रधान जे. आर. बरिंगत और उपखंड अधिकारी मि. रेमिंगटन अपने सिपाही और अश्त्र शस्त्र के साथ वहा पहाचते है। किसान खजाना काम करने के लिए नारा लगाते है। लेकिन ब्रिटिश के अधिकारी खजाना कम करने को तय्यार नही
होते। दोनो पक्ष में बहस शुरू होने लगता है। परिस्थिति बहुत उत्तेजना पूर्ण हो जाता है और बरिंगत के आदेश पर सारे सिपाही उन किसानों के ऊपर अंधा ढूंढ गोली चलाना शुरू कर देता है। किसान भी लाठी डंडा हाथ मे जो भी था उनके सहारे उनलोगों को उपर टुट पडा। लेकिन
बंदुक कि गोलीयो ने उन किसानो को धारती माँ के गोद मे सुला देया। जो किसान धरती माँ के
गोद मे फसल उगाते थे। उसी धरती माँ का आँचल उन किसानों के खुन से लाल हो गया था।
पखरुघाट के जमीन पर १४० (140) किसाने ने अपना बलिगान दिया और १५० (150) किसान घायल हो गया। ब्रिटिश ने अपना कला चरित्र छुपाने के लिये सरकारी दस्ताबेजो पर १५ (15) की मौत और ३७ (37) का ही मौत प्रकाषित किया। लेकिन सत्य किसीके चाहने या ना
चाहने से नही छुपता, एक ना एक दिन अंधेरी की काली घताओ को चीर कर प्रकाश होता ही
है।
पथरुघात बिग्रोह की स्मृति
१९८७ (1987) के २८ (28) जनवरी तारीख से ही सदो असम छात्र संस्था (All Assam Student Union) हर साल के इस दिन को कृषक शाहिद दिवस के उपलक्ष में पालन करते आये है। भरत के सैनिक भी २९ (29) जनवरी, २००० से पथरुघात के शहीदों को सामरिक सन्मान प्रदान करते आ रहे है। किसान शहीदों के सन्मान के लिये भारतीय सैनिकों ने शाहिद स्तम्भ भी स्थापन किये है।
अपने हक के लिए उन किसानों ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया। हमारे देश के किसान ना सिर्फ देश के लोगो का पेट भरते है बल्कि जरूरत पड़ने पर भारत माँ के लिए अपने जीवन का आहुति भी दे सकते है; पथरुघात विद्रोह इसीका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। एसे हजारो उदाहरण मिल जाएंगे जहा हमारे भारत माँ के किसान संतानों ने देश के लिए, देश के लोगो के लिए हजारो त्याग सहे है। शत शत नमन है इसे किसानों को।
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